बढ़ता अविश्वास, नाज़ुक सुन्नी-शिया राजनीतिक संतुलन ने गिलगित-बाल्टिस्तान की अशांति को और गहराया

2025 में सुरक्षा स्थिति और अधिक बिगड़ गई। गिलगित-बाल्टिस्तान स्काउट्स की एक चेकपोस्ट पर हुए आतंकवादी हमले में दो लोगों की मौत हुई और एक घायल हो गया, जिससे तनाव और बढ़ गया। बाद में सोस्त में फिर से विरोध-प्रदर्शन शुरू हुए, जिससे खुंजराब दर्रे के ज़रिये पाकिस्तान और चीन के बीच होने वाला व्यापार बाधित हुआ। वर्ष का अंत 5 अक्टूबर को हुए दो हाई-प्रोफ़ाइल हमलों के साथ हुआ, जब अज्ञात बंदूकधारियों ने गिलगित में पुलिस मुख्यालय के पास गिलगित-बाल्टिस्तान और कोहिस्तान में अहले-सुन्नत वल जमात के अमीर मौलाना क़ाज़ी निसार अहमद पर घात लगाकर हमला किया, जिसमें वे और कई अन्य लोग घायल हो गए। उसी दिन, गिलगित-बाल्टिस्तान के मुख्य न्यायालय के न्यायाधीश मलिक इनायत-उर-रहमान सिटी अस्पताल के पास एक हत्या के प्रयास में बाल-बाल बच गए।

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Gilgit-Baltistan Moutain Region

पाकिस्तान के अवैध कब्ज़े वाले भारतीय पर्वतीय क्षेत्र गिलगित-बाल्टिस्तान में अशांति लगातार बनी हुई है और 2026 की शुरुआत भी अस्थिर संकेतों के साथ हुई है। गिलगित-बाल्टिस्तान विधानसभा चुनाव—जो मूल रूप से 24 जनवरी 2026 को होने थे—और 14 फ़रवरी को निर्धारित स्थानीय निकाय चुनावों के स्थगन के बाद राजनीतिक अनिश्चितता और बढ़ गई है। इस लेख के लिखे जाने तक नई तिथियों की घोषणा नहीं की गई थी।

यह स्थगन गिलगित-बाल्टिस्तान सशक्तीकरण और स्वशासन आदेश—जो 2009 में लागू हुआ था और जिसके माध्यम से पाकिस्तान सरकार क्षेत्र के लोगों को सीमित स्वशासन प्रदान करती है—तथा संबंधित चुनावी क़ानूनों का उल्लंघन है। इन क़ानूनों के अनुसार, स्थानीय विधानसभा का पाँच वर्षीय कार्यकाल पूरा होने पर उसके भंग होने के 60 दिनों के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य है। चूँकि विधानसभा नवंबर 2025 में भंग कर दी गई थी, इसलिए 24 जनवरी 2026 मतदान की अंतिम वैध तिथि थी। आधिकारिक तर्क—कठोर शीतकालीन परिस्थितियाँ और भारी हिमपात से उत्पन्न लॉजिस्टिक चुनौतियाँ—स्थानीय आबादी को आश्वस्त करने में विफल रहा है।

विरोध-प्रदर्शन और हिंसा

2026 की शुरुआत में नए विरोध-प्रदर्शनों का तात्कालिक कारण विधानसभा भंग होने के बाद गठित कार्यवाहक सरकार की संरचना रही है। पूर्व न्यायाधीश यार मुहम्मद नसीर के नेतृत्व में बनी यह कार्यवाहक प्रशासनिक व्यवस्था मुख्यतः चुनावी प्रक्रिया की निगरानी के लिए थी। हालांकि, 14 सदस्यीय कार्यवाहक मंत्रिमंडल—जिसमें 12 मंत्री और दो सलाहकार शामिल हैं—के गठन को लेकर विवाद खड़ा हो गया। कुछ नियुक्तियों में भविष्य के चुनावी नतीजों को प्रभावित करने के उद्देश्य से पक्षपातपूर्ण विचारों के इस्तेमाल के आरोपों ने प्रदर्शन भड़का दिए। इन विरोध-प्रदर्शनों का नेतृत्व गिलगित-बाल्टिस्तान यूथ मूवमेंट कर रहा है, जिसके नेता अजफ़र जमशेद ने चेतावनी दी है कि यदि युवाओं को परामर्श प्रक्रिया से बाहर रखा गया, तो आंदोलन जारी रहेगा। इसी दौरान, हुंजा सहित कई इलाक़ों में निवासियों ने पानी और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं की माँग को लेकर भी प्रदर्शन शुरू किए हैं।

ये घटनाक्रम 2025 में चली आ रही निरंतर अस्थिरता की पृष्ठभूमि में सामने आए हैं। उस वर्ष के दौरान गिलगित-बाल्टिस्तान में तेज़ी से एक के बाद एक विरोध-प्रदर्शन और हिंसक घटनाएँ हुईं, जो गहरे जन असंतोष को दर्शाती हैं। जनवरी 2025 की शुरुआत में, निवासियों ने गंभीर बिजली संकट के ख़िलाफ़ छह दिनों तक प्रदर्शन किया, जहाँ रोज़ाना 22 घंटे तक बिजली कटौती हो रही थी। प्रदर्शनकारियों ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण काराकोरम राजमार्ग सहित प्रमुख सड़कों को अवरुद्ध कर दिया। सरकारी आश्वासनों के बाद कि बिजली कटौती कम की जाएगी, यह आंदोलन समाप्त हुआ। इसके तुरंत बाद, हुंजा के सोस्त में व्यापारियों ने कराधान और सीमा-शुल्क निकासी से जुड़े मुद्दों पर धरना दिया और फिर से काराकोरम राजमार्ग को अवरुद्ध कर दिया।

2025 में सुरक्षा स्थिति और भी बिगड़ी। गिलगित-बाल्टिस्तान स्काउट्स की एक चेकपोस्ट पर हुए आतंकवादी हमले में दो लोगों की मौत और एक के घायल होने से तनाव बढ़ गया। बाद में सोस्त में विरोध-प्रदर्शन फिर शुरू हुए, जिससे खुंजराब दर्रे के माध्यम से पाकिस्तान-चीन व्यापार बाधित हुआ। वर्ष का अंत 5 अक्टूबर को हुए दो बड़े हमलों के साथ हुआ—जब अज्ञात बंदूकधारियों ने गिलगित में पुलिस मुख्यालय के पास गिलगित-बाल्टिस्तान और कोहिस्तान में अहले-सुन्नत वल जमात के अमीर मौलाना क़ाज़ी निसार अहमद पर घात लगाकर हमला किया, जिसमें वे और कई अन्य घायल हुए। उसी दिन, गिलगित-बाल्टिस्तान के मुख्य न्यायालय के न्यायाधीश मलिक इनायत-उर-रहमान सिटी अस्पताल के पास एक हत्या के प्रयास में बाल-बाल बचे। तत्कालीन मुख्यमंत्री और स्थानीय सेना कमांडर घायल मौलवी से मिलने पहुँचे, जिससे नाज़ुक शिया-सुन्नी संतुलन को लेकर चिंताएँ और उजागर हुईं।

शिया अविश्वास, चीनी उपस्थिति

इस संकट के केंद्र में गिलगित-बाल्टिस्तान की शिया-बहुल आबादी और इस्लामाबाद के राजनीतिक-प्रशासनिक तंत्र के बीच गहरा और दीर्घकालिक अविश्वास है, जिसकी जड़ें इस क्षेत्र के जम्मू-कश्मीर से ऐतिहासिक संबंधों में निहित हैं। दशकों के दमन, सांप्रदायिक इंजीनियरिंग और चयनात्मक मताधिकार-वंचना—विशेषकर 1970 के दशक के उत्तरार्ध में ईरान की शिया क्रांति के बाद—ने इस अलगाव को और गहरा किया है। इन कारकों के साथ-साथ इस्लामाबाद की रणनीतिक प्राथमिकताएँ, खासकर चीन-समर्थित चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के तहत परियोजनाएँ, स्थानीय समुदायों को और हाशिये पर धकेलती रही हैं। नतीजतन, गिलगित-बाल्टिस्तान के राजनीतिक भविष्य और उसकी दीर्घकालिक स्थिरता को लेकर गंभीर सवाल बने हुए हैं।

(लेखक भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों—विशेषकर जम्मू-कश्मीर—के अध्ययन में विशेषज्ञता रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक हैं। व्यक्त विचार पूरी तरह व्यक्तिगत हैं। उनसे pushpsaraf@yahoo.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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