राजनीतिक रणनीति के रूप में भीड़ का शासन: बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष स्मृति और बहुलतावादी बंगाली संस्कृति का पुनर्गठन

1971 के आदर्श समावेशन, मानवीय गरिमा और उत्पीड़न के विरुद्ध प्रतिरोध का प्रतिनिधित्व करते हैं। बाउल और सूफ़ी परंपराएँ कट्टर विचारों को अस्वीकार करती हैं और मानवतावाद तथा सह-अस्तित्व को बढ़ावा देती हैं। बंगाल में इस्लाम का आगमन मुख्यतः सूफ़ियों के माध्यम से हुआ—जो फ़ारस, अरब और मध्य एशिया से आए थे—और जिन्होंने आध्यात्मिकता, सहिष्णुता और समायोजन पर ज़ोर दिया। ये परंपराएँ स्थानीय हिंदू परंपराओं के साथ मेल खाती रहीं और बाउल दर्शन जैसे समन्वित (सिन्क्रेटिक) रूपों का उदय हुआ। रवीन्द्रनाथ टैगोर और काज़ी नज़रुल इस्लाम इस सभ्यतागत समन्वय के प्रतीक हैं।

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Rabindranath Tagore and Kazi Nazrul Islam

बांग्लादेश में 2024 का युवाओं के नेतृत्व वाला आंदोलन, 1971 के आदर्शों और बंगाली सांस्कृतिक बहुलता के माध्यम से सामूहिक भावनात्मक एकजुटता का एक महत्वपूर्ण क्षण बना। यह आंदोलन किसी स्पष्ट नेतृत्व या ठोस कार्ययोजना के तहत विकसित नहीं हुआ, बल्कि एक साझा राजनीतिक भाषा, साझा प्रतीकों—जैसे दीवारों पर बने ग्रैफिटी, मीम्स और चित्रों—के जरिए आगे बढ़ा। दीवारों पर उकेरे गए चित्रों और सोशल मीडिया पर फैले मीम्स ने बहुलतावाद की एक तस्वीर पेश की। सबसे अहम बात यह थी कि इसकी साझा नैतिक जड़ें स्वतंत्रता, गरिमा, न्याय और भेदभाव के विरुद्ध प्रतिरोध से प्रेरित थीं।

यह आंदोलन मुख्य रूप से एक साझा नैतिक कल्पना के बल पर टिका रहा। यह कल्पना बंगाली सभ्यतागत आधार से उपजी थी—यानी मुक्ति संग्राम और धार्मिक सह-अस्तित्व की बंगाली परंपरा से।

इसी नैतिक संसार ने छात्रों को न केवल स्वयं को, बल्कि मज़दूरों, माताओं, सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों को भी संगठित करने में सक्षम बनाया। इसलिए इस आंदोलन की सफलता का श्रेय केवल छात्रों को ही नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग के लोगों को जाता है। प्रदर्शनकारियों ने ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना प्रस्तुत की जो जातीयता, धर्म, लिंग और वर्ग-आधारित भेदभाव व उत्पीड़न से मुक्त हो। उस समय कई लोगों को लगा कि यह न केवल लोकतंत्र को बहाल कर सकता है, बल्कि मुक्ति संग्राम के वादे को भी पूरा कर सकता है।

लेकिन बाद के दौर में, जिन राजनीतिक शक्तियों ने सत्ता को मजबूत किया, उन्होंने भय पैदा करने के लिए धर्मनिरपेक्षता-विरोधी लामबंदी और भीड़ के शासन का सहारा लेकर उन्हीं बुनियादों को कमजोर कर दिया।

राजनीतिक रणनीति के रूप में भीड़ का शासन

बांग्लादेश में जो कुछ हम देख रहे हैं, उसे केवल स्वतःस्फूर्त अराजकता या कानून-व्यवस्था के पतन के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। भीड़ का शासन एक सुनियोजित राजनीतिक रणनीति के रूप में काम कर रहा है, जिसका उद्देश्य भय फैलाना और सार्वजनिक स्मृति को नए सिरे से गढ़ना है। यह रणनीति चयनात्मक निशानेबाज़ी, जवाबदेही के अभाव, सत्ता पक्ष की चुप्पी या मिलीभगत और नैतिक औचित्य के ज़रिए संचालित होती है।

हमने स्वतंत्रता सेनानियों का लगातार अपमान, बाउल और सूफ़ी दरगाहों पर व्यवस्थित हमले, मुक्ति संग्राम के स्मारकों का ध्वंस, महिलाओं के लिए सार्वजनिक स्थानों का सिमटना तथा पत्रकारों, शिक्षाविदों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियाँ देखी हैं।

उदाहरण के तौर पर, चटगाँव प्रेस क्लब पर भीड़ के हमलों के ज़रिए कब्ज़ा कर लिया गया, प्रबंधन समिति को बाहर कर दिया गया और उसकी जगह नई समिति बिठा दी गई। कई पत्रकारों को उनके पदों से हटा दिया गया और नए लोगों की नियुक्ति की गई। देश के प्रमुख मीडिया और अख़बार समूह—जैसे प्रथम आलो और डेली स्टार—पर भी भीड़ ने हमले किए और आगज़नी की।

सरकार इन भीड़ों को रोकने की कोशिश न करके और चुप रहकर अप्रत्यक्ष रूप से उनका समर्थन करती दिखाई दी। हैरानी की बात यह रही कि सरकार ने यह तक कहा कि ये भीड़ “दबाव समूह” हैं। जब अनीस आलमगीर जैसे पत्रकार ने सरकार की इस चुप्पी और समर्थन की आलोचना की, तो उन्हें बांग्लादेश के आतंकवाद-रोधी क़ानून के तहत गिरफ़्तार कर लिया गया। इस तरह भय, चुप्पी, आलोचना के दमन और राजनीतिक असहमति को दबाने का माहौल बनाया गया।

2024 के आंदोलन के बाद उभरी नई राजनीतिक शक्तियाँ युवाओं को ग़लत सूचनाओं, 1971 के बारे में गढ़े गए इतिहास, इस्लाम की विकृत व्याख्याओं और वैचारिक टकराव की कथाओं के ज़रिए लामबंद कर रही हैं। युवाओं से कहा जा रहा है कि 1971 एक धार्मिक युद्ध था, जिसका उद्देश्य पाकिस्तानी और बंगाली मुस्लिम भाइयों को अलग करना था। उन्हें गरिमा, आर्थिक मुक्ति और सांस्कृतिक स्वतंत्रता के लिए लोगों के लंबे संघर्ष के बारे में नहीं बताया जाता।

यह भी नहीं बताया जाता कि पाकिस्तानी शासक व्यवस्था बंगाली मुसलमानों को “शुद्ध मुसलमान” नहीं मानती थी, बल्कि उनके साथ भारी भेदभाव करती थी। पाकिस्तानी तानाशाह फ़ील्ड मार्शल अयूब ख़ान ने अपनी पुस्तक Friends, Not Masters: A Political Autobiography में बंगाली मुसलमानों को हिंदू प्रभाव से ग्रस्त बताया और पाकिस्तानी मुसलमानों को श्रेष्ठ नस्ल कहा।

ये समूह युवाओं को ऐसे दृष्टिकोण के माध्यम से संगठित करते हैं, जिसमें धर्मनिरपेक्षता, सूफ़ी परंपराएँ, हिंदू सांस्कृतिक विरासत, सांस्कृतिक संस्थान और यहाँ तक कि महिलाओं की सार्वजनिक उपस्थिति को भी अपने राजनीतिक लक्ष्यों में बाधा के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि उदिची जैसे सांस्कृतिक संस्थान हमलों के निशाने पर हैं।

हिंदुओं पर हमले और भय की राजनीति

भीड़ की रणनीति का एक प्रमुख रूप हिंदू अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना रहा है। अंतरिम सरकार के प्रमुख मुहम्मद यूनुस ने एक बार दावा किया था कि हिंदुओं पर हमले धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक हैं। लेकिन हकीकत यह है कि हिंदुओं के घर जलाए गए, मंदिरों में तोड़फोड़ की गई और लोगों पर “भारतीय एजेंट” होने के आरोप लगाकर हमले किए गए। हिंदू समुदाय भयभीत महसूस कर रहा है; कई लोग पड़ोसी पश्चिम बंगाल चले गए हैं। बहुत से लोग लगातार असुरक्षा और मानसिक आघात में जी रहे हैं।

एक घटना में 69 वर्षीय हिंदू नाई परेश चंद्र शील और उनके बेटे को कट्टरपंथी मुस्लिम भीड़ ने ईशनिंदा के आरोप में पीट-पीटकर मार डाला।

सबसे भयावह घटनाओं में से एक युवा फैक्ट्री मज़दूर दीपु चंद्र दास की हत्या थी। उस पर झूठा आरोप लगाया गया, उसे उसके कार्यस्थल से अगवा किया गया, फिर ईशनिंदा के नाम पर भीड़ ने उसकी हत्या कर सार्वजनिक रूप से उसके शव को जला दिया।

2022 की जनगणना के अनुसार, बांग्लादेश की जनसंख्या लगभग 16.5 करोड़ है, जिसमें करीब 1.3 करोड़ हिंदू हैं। बंगाली जातीय बहुलता वाले देश में होने के बावजूद, हिंदुओं को—उनकी बंगाली पहचान के बावजूद—निशाना बनाया जा रहा है।

1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान भी पाकिस्तानी सेना ने हिंदुओं को यह कहकर निशाना बनाया था कि वे भारतीय एजेंट हैं। मेरे माता-पिता बताते हैं कि किस तरह हिंदू पड़ोसियों को हमारे घरों में मुसलमानों के वेश में छिपाया गया और उन्हें क़ुरान की आयतें तक सिखाई गईं, ताकि वे सैन्य जाँच से बच सकें। यह उस बंगाली नैतिक संसार को दर्शाता है, जहाँ धार्मिक भिन्नता मानवीय गरिमा को नकारती नहीं थी।

आज सबसे चिंताजनक बात यह है कि हिंदुओं को निशाना बनाने का काम किसी विदेशी कब्ज़ाधारी द्वारा नहीं, बल्कि घरेलू राजनीतिक लामबंदी के ज़रिए उसी जातीय समुदाय के लोगों द्वारा किया जा रहा है।

बहुलतावादी परंपराएँ निशाने पर क्यों हैं

एक गहरा सवाल यह है कि दरगाहों, गीतों, स्मारकों और सांस्कृतिक संस्थानों को निशाना क्यों बनाया जा रहा है? 1971 के आदर्श समावेशन, मानवीय गरिमा और उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक हैं। बाउल और सूफ़ी परंपराएँ कट्टर सोच को नकारती हैं और मानवतावाद व सह-अस्तित्व को बढ़ावा देती हैं। बंगाल में इस्लाम का प्रसार मुख्यतः फ़ारस, अरब और मध्य एशिया से आए सूफ़ियों के माध्यम से हुआ, जिन्होंने आध्यात्मिकता, सहिष्णुता और समायोजन पर ज़ोर दिया। ये परंपराएँ स्थानीय हिंदू परंपराओं से मेल खाती रहीं और बाउल दर्शन जैसे समन्वित रूप विकसित हुए।

रवीन्द्रनाथ टैगोर और काज़ी नज़रुल इस्लाम इस सभ्यतागत समन्वय के प्रतीक हैं। नज़रुल ने न केवल मानवतावाद पर बल दिया, बल्कि अनेक हिंदू श्यामा संगीत भी रचे, जो आज भी हिंदू पूजा उत्सवों में गाए जाते हैं। बंगाली बाउल और रहस्यवादी कवि लालन शाह ने धार्मिक और जातीय विभाजन को अस्वीकार किया।

यही कारण है कि आज ये परंपराएँ हमले के दायरे में हैं, क्योंकि धर्मनिरपेक्ष स्मृति और बहुलतावादी बंगाली संस्कृति धार्मिक कट्टर लामबंदी के रास्ते में संरचनात्मक बाधा खड़ी करती हैं। संक्षेप में, हमने युवाओं के नेतृत्व वाले आंदोलन में सामूहिक नैतिक कल्पना की शक्ति देखी, लेकिन उसके बाद के दौर ने यह भी दिखाया कि उस कल्पना को कितनी आसानी से अपने कब्ज़े में लेकर उलट दिया जा सकता है।

बांग्लादेश के लोकतंत्र को केवल चुनावों या संस्थाओं के माध्यम से नहीं समझा जा सकता। उसे उसकी सभ्यतागत जड़ों—बहुलतावाद, सहिष्णुता और मानवीय गरिमा—के आधार पर समझना होगा। सवाल यह है कि क्या बांग्लादेश, आज की राजनीति पर हावी भीड़ के शासन, भय और सांस्कृतिक मिटा दिए जाने की प्रवृत्ति का सामना किए बिना, अपने लोकतांत्रिक और बहुलतावादी मूल्यों को फिर से हासिल कर सकता है?

(लेखक जर्मनी की हाइडेलबर्ग यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान में पीएचडी हैं। व्यक्त विचार निजी हैं। संपर्क: meahmostafiz@gmail.com)

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