बेहतर एआई डिज़ाइनर बनने के लिए इंजीनियरों को जीवविज्ञान सीखना चाहिए

वर्तमान समय में हमारे सभी रोबोट और एआई मशीनें आदि मानव शरीर की संरचना के आधार पर डिज़ाइन की जा रही हैं। हम अपने कंप्यूटर और प्रोसेसर को अधिक कुशल बनाने के लिए अभी भी संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन वे कभी भी मानव मस्तिष्क और सोच के क़रीब नहीं पहुँच सकते। हालांकि एआई के “पुजारी” इससे अलग राय रखते हैं।

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इंजीनियरों से अपेक्षा की जाती है कि वे नई मशीनें और प्रणालियाँ डिज़ाइन करें। इसके लिए वे अपने विषय में गहराई से अध्ययन करते हैं और बेहतर डिज़ाइन तैयार करते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि वे अपने डिज़ाइन-जगत में मौजूद ज्ञान तक ही सीमित रह जाते हैं। यदि वे जीवन और जैविक संरचनाओं को समझें, तो उनकी सोच का दायरा कई गुना बढ़ सकता है और वे बेहतर आविष्कार कर सकते हैं। इसे बायोमिमिक्री (प्रकृति से सीखने का विज्ञान) कहा जाता है।

आज दुनिया भर में अनेक इंजीनियरिंग डिज़ाइन नए पदार्थ, प्रक्रियाएँ और आविष्कार विकसित करने के लिए बायोमिमिक्री का उपयोग कर रहे हैं। परंतु अक्सर यह काम वर्षों के अनुभव के बाद होता है। यदि विद्यार्थियों को अपनी पढ़ाई और करियर की शुरुआत में ही जैविक डिज़ाइनों की बुनियादी समझ मिल जाए, तो ये प्रयास और अधिक बेहतर तथा तेज़ हो सकते हैं।

मैं हमेशा मानता आया हूँ कि प्रकृति के पास सभी उत्तर हैं। यह विचार मुझे 1970 के दशक की शुरुआत में अमेरिका में अपने छात्र जीवन के दौरान दृढ़ हुआ।

प्रकृति के पास सभी उत्तर हैं

मैं अपने पीएचडी शोध के दौरान सौर ऊर्जा के तापीय उपयोगों पर काम कर रहा था और मुझे लगा कि यदि सोलर कलेक्टर सूर्य का अनुसरण करें तो उनकी उपयोगिता और दक्षता बढ़ सकती है। इससे यह जिज्ञासा पैदा हुई कि प्रकृति में कौन-सी प्रणालियाँ सूर्य का अनुसरण करती हैं। इसी से मुझे सूरजमुखी के सूर्य का पीछा करने की प्रक्रिया का अध्ययन करने की प्रेरणा मिली। आगे चलकर मैंने प्राकृतिक प्रणालियों में द्रव यांत्रिकी से जुड़े कई रोचक पहलुओं का अध्ययन किया—जैसे पेड़ों में पानी 50–100 मीटर ऊँचाई तक कैसे पहुँचता है, या वीनस फ्लाइट्रैप कैसे कार्य करता है।

इसी प्रकार, अमेरिका में हमारी प्रयोगशाला में हम सौर ऊर्जा मापने के लिए एक बेहतर पायरोनोमीटर विकसित करना चाहते थे। संयोग से मैंने पढ़ा कि रैटल स्नेक के सिर के दोनों ओर स्थित गड्ढे अत्यंत कुशल अवरक्त (आईआर) रिसेप्टर होते हैं, जिनसे वह गर्म शिकार का पता लगाता है। इससे मुझे यह समझ मिली कि प्रकृति किस तरह अत्यंत प्रभावी डिज़ाइन अपनाती है।

इसी तरह, मानव मांसपेशियों द्वारा रासायनिक ऊर्जा का यांत्रिक गति में रूपांतरण भी इस विश्वास को और मज़बूत करता है कि प्रकृति के पास सभी उत्तर हैं और उसकी डिज़ाइन रणनीतियाँ हमसे कहीं अधिक विकसित हैं। आज हमारी लगभग सभी तकनीकें, जो यांत्रिक शक्ति उत्पन्न करती हैं, ऊष्मीय ऊर्जा रूपांतरण पर आधारित हैं—जैसे आंतरिक दहन इंजन या विद्युत मोटर, जिनकी बिजली उच्च तापमान पर चलने वाले बिजलीघरों से आती है।

प्रकृति यह रूपांतरण कहीं अधिक कुशलता से और सामान्य तापमान पर करती है। प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से सौर ऊर्जा भोजन (रसायनों) में बदलती है और वही भोजन जानवरों और मनुष्यों द्वारा सीधे मांसपेशियों के माध्यम से यांत्रिक ऊर्जा में बदल दिया जाता है।

इन विचारों ने मुझे अमेरिका में University of Florida में बायोमिमिक्री विषय पर अंतर्विषयक सेमिनार शुरू करने के लिए प्रेरित किया। 1970 के दशक के अंत में यह विषय अमेरिका में भी लगभग नया था। इन सेमिनारों में मैंने विभिन्न विभागों के प्रतिष्ठित शिक्षकों को आमंत्रित किया, ताकि वे यह बता सकें कि प्रकृति न्यूनतम चरणों में और सामान्य तापमान पर एक ऊर्जा रूप को दूसरे में कैसे बदलती है और हम इन प्रक्रियाओं से क्या सीख सकते हैं।

विचारों का पार-परागण

अब समय के साथ और अधिक ज्ञान प्राप्त होने पर यह समझ बनी है कि जैविक जीवन प्रकृति की सभी शक्तियों के क्रिस्टलीकरण का परिणाम है और संपूर्ण विकासात्मक प्रक्रिया का हिस्सा है।

क्योंकि हमारा मस्तिष्क भी उसी ब्रह्मांडीय समय-ढाँचे का हिस्सा है, इसलिए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि हम किसी भी विषय पर उससे अधिक नहीं सोच सकते जो पहले से अस्तित्व में है। इस प्रकार, प्रकृति और जीवन-रूप इंजीनियरिंग के चमत्कार हैं। हमारे लिए सबसे अच्छा यही है कि हम उन्हें समझें और उनकी नकल करें। डिज़ाइन के विकास में उन्हें हम पर लाखों वर्षों की बढ़त प्राप्त है।

इसीलिए मेरा मानना है कि सभी इंजीनियरिंग छात्रों को जीवित प्रणालियों और प्रक्रियाओं को समझने तथा उनकी नकल करने के सिद्धांतों में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। इसके लिए इंजीनियरों को जीवविज्ञान और जैविक प्रक्रियाओं का अध्ययन करना आवश्यक है।

भारत में अब अधिक से अधिक इंजीनियरिंग कॉलेज चिकित्सा पाठ्यक्रम और डिग्रियाँ भी प्रदान कर रहे हैं। दुर्भाग्य से, कई बार इसका उद्देश्य उच्च स्तर की शैक्षणिक दृष्टि के बजाय अधिक छात्रों को आकर्षित कर वित्तीय लाभ प्राप्त करना होता है। फिर भी आशा है कि एक ही परिसर में चिकित्सा और इंजीनियरिंग समुदाय के बीच विचारों का पार-परागण बायोमिमिक्री के माध्यम से डिज़ाइन इंजीनियरिंग को आगे बढ़ाएगा। यह वास्तव में होगा या नहीं, यह समय ही बताएगा। अमेरिका के विश्वविद्यालयों में, हालांकि, इस तरह का सहयोग सामान्य बात है।

जैविक जीवन की समझ

मेरा यह भी दृढ़ विश्वास है कि हमारी तकनीकी प्रगति तभी होगी जब हम जैविक जीवन—विशेषकर मानव शरीर—को सही ढंग से समझेंगे, जिसके बारे में वास्तव में हमारी जानकारी बहुत सीमित है। वास्तव में, इंजीनियरिंग की लगभग हर चीज़ मानव शरीर या जीवन को समझकर सीखी जा सकती है।

आज हमारे सभी रोबोट और एआई मशीनें मानव शरीर की संरचना के आधार पर डिज़ाइन की जा रही हैं। हम अपने कंप्यूटर और प्रोसेसर को अधिक कुशल बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन वे कभी भी मस्तिष्क और मानवीय सोच के क़रीब नहीं पहुँच सकते। एआई समर्थक इससे सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि यह केवल समय की बात है जब एआई सोचने की प्रक्रिया में मनुष्यों को पीछे छोड़ देगा। लेकिन मुझे इस पर गंभीर संदेह है। मेरा मानना है कि वास्तव में बड़े आविष्कार और पारंपरिक सोच से हटकर नए विचार केवल मानव मस्तिष्क से ही आ सकते हैं, न कि एआई से।

चिकित्सा शिक्षा के मॉडल पर इंजीनियरिंग शिक्षा

बुनियादी चिकित्सा पाठ्यक्रम (एमबीबीएस) से स्नातक होने वाले छात्रों को रोगियों का उपचार करने तथा मानव शरीर रचना की सामान्य समझ दी जाती है। चिकित्सा के विभिन्न क्षेत्रों में विशेषज्ञता आम तौर पर परास्नातक स्तर पर प्राप्त की जाती है।

इसके विपरीत, भारत में वर्तमान इंजीनियरिंग शिक्षा अत्यंत अपर्याप्त है। अधिकांश पाठ्यक्रम इंजीनियरिंग डिज़ाइन के विस्तृत गणितीय ढाँचे को सीखने पर केंद्रित हैं, न कि व्यावहारिक इंजीनियरिंग अनुप्रयोगों पर। परिणामस्वरूप, एक नया इंजीनियरिंग स्नातक वास्तव में इंजीनियर कहलाने योग्य नहीं रह जाता।

अतीत में हमारे संस्थान में प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेजों से आए कई यांत्रिक अभियंत्रण स्नातक इंटर्न और इंजीनियर के रूप में कार्यरत थे। उनमें से कुछ को प्लायर और स्क्रूड्राइवर के बीच का अंतर तक नहीं पता था। उन्होंने कभी वास्तविक इंजीनियरिंग सीखी ही नहीं—केवल परीक्षाएँ पास की थीं।

इसीलिए मेरा व्यक्तिगत मत है कि इंजीनियरिंग शिक्षा को भी चिकित्सा शिक्षा की तरह बनाया जाना चाहिए, जहाँ छात्र अपने हाथों से काम करके वास्तविक इंजीनियरिंग सीखें। इसके साथ-साथ उन्हें मशीनों के डिज़ाइन में प्रयुक्त बुनियादी इंजीनियरिंग सिद्धांत भी सिखाए जाने चाहिए। जीवविज्ञान की समझ इस सीख को और सुदृढ़ करेगी।

(लेखक, आईआईटी और अमेरिका में शिक्षित भारतीय आध्यात्मिक इंजीनियर तथा ग्रामीण विकास के अग्रदूत, वर्ष 2022 के पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित हैं। वे महाराष्ट्र के फलटण स्थित Nimbkar Agricultural Research Institute के निदेशक हैं। उनसे anilrajvanshi50@gmail.com / @anilraj24.bsky.social पर संपर्क किया जा सकता है।

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